Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 8.14 / 28

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)8.14

8.14
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः । तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥ ८-१४ ॥
ananyacetāḥ satataṃ yo māṃ smarati nityaśaḥ | tasyāhaṃ sulabhaḥ pārtha nityayuktasya yoginaḥ || 8-14 ||
— अनन्य चित्त से निरन्तर ; — जो मुझे नित्य स्मरण करता है ; — उसके लिए मैं सुलभ हूँ, हे पार्थ ; — नित्ययुक्त योगी के लिए

हे पार्थ, जो अनन्य चित्त से सदा नित्य ही मुझे स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगी के लिए मैं सुलभ हूँ।