Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 6.1 / 49

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)6.1

6.1
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः । स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥ ६-१ ॥
anāśritaḥ karmaphalaṃ kāryaṃ karma karoti yaḥ | sa saṃnyāsī ca yogī ca na niragnirna cākriyaḥ || 6-1 ||
— कर्मफल का आश्रय न लेकर ; — जो करने योग्य कर्म करता है ; — वही संन्यासी और योगी ; — न अग्नि का त्यागी, न कर्म का त्यागी

जो कर्मफल का आश्रय लिए बिना करने योग्य कर्म करता है, वही संन्यासी और योगी है, न कि वह जो अग्नि का त्याग करता है, और न वह जो कर्म का त्याग करता है।