Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 6.2 / 49

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)6.2

6.2
यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव । न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन ॥ ६-२ ॥
yaṃ saṃnyāsamiti prāhuryogaṃ taṃ viddhi pāṇḍava | na hyasaṃnyastasaṅkalpo yogī bhavati kaścana || 6-2 ||
— जिसे संन्यास कहते हैं ; — उसी को योग जान, हे पाण्डव ; — क्योंकि संकल्प का त्याग किए बिना ; — कोई भी योगी नहीं होता

हे पाण्डव, जिसे संन्यास कहते हैं, उसी को योग जानो; क्योंकि संकल्प का त्याग किए बिना कोई भी योगी नहीं होता।