Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 4.40 / 42

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)4.40

4.40
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति । नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥ ४-४० ॥
ajñaścāśraddadhānaśca saṃśayātmā vinaśyati | nāyaṃ loko'sti na paro na sukhaṃ saṃśayātmanaḥ || 4-40 ||
— अज्ञानी और श्रद्धारहित ; — संशययुक्त नष्ट हो जाता है ; — न इसके लिए यह लोक न परलोक ; — न सुख संशययुक्त के लिए

अज्ञानी, श्रद्धारहित और संशययुक्त पुरुष नष्ट हो जाता है; संशययुक्त के लिए न यह लोक है, न परलोक, न सुख।