Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 4.17 / 42

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)4.17

4.17
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः । अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ॥ ४-१७ ॥
karmaṇo hyapi boddhavyaṃ boddhavyaṃ ca vikarmaṇaḥ | akarmaṇaśca boddhavyaṃ gahanā karmaṇo gatiḥ || 4-17 ||
— कर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए ; — और विकर्म (निषिद्ध कर्म) का ; — और अकर्म का भी जानना चाहिए ; — कर्म की गति गहन है

क्योंकि कर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए, विकर्म (निषिद्ध कर्म) का भी और अकर्म का भी; कर्म की गति गहन है।