Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 4.18 / 42

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)4.18

4.18
कर्मण्यकर्म यः पश्यत्यकर्मणि च कर्म यः । स बुद्धिमान् मनुष्येषु स चोक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥ ४-१८ ॥
karmaṇyakarma yaḥ paśyatyakarmaṇi ca karma yaḥ | sa buddhimān manuṣyeṣu sa coktaḥ kṛtsnakarmakṛt || 4-18 ||
— जो कर्म में अकर्म देखता है ; — और अकर्म में कर्म ; — वह मनुष्यों में बुद्धिमान् ; — और समस्त कर्मों को करने वाला कहा गया

जो कर्म में अकर्म को देखता है और अकर्म में कर्म को देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान् है; वह युक्त है और समस्त कर्मों को करने वाला कहा गया है।