Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 2.33 / 74

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)2.33

2.33
यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् । सुकृतात्क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥ २-३३ ॥
yadṛcchayā copapannaṃ svargadvāramapāvṛtam | sukṛtātkṣatriyāḥ pārtha labhante yuddhamīdṛśam || 2-33 ||
— सौभाग्य से प्राप्त ; — स्वर्ग का खुला द्वार ; — सुकृत से, हे पार्थ, क्षत्रिय ; — ऐसा युद्ध पाते हैं

हे पार्थ, सौभाग्य से प्राप्त, स्वर्ग का खुला द्वार-स्वरूप ऐसा युद्ध सुकृती क्षत्रिय ही पाते हैं।