Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 2.32 / 74

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)2.32

2.32
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि । धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥ २-३२ ॥
svadharmamapi cāvekṣya na vikampitumarhasi | dharmyāddhi yuddhācchreyo'nyatkṣatriyasya na vidyate || 2-32 ||
— और अपने धर्म को देखते हुए भी ; — विचलित होना उचित नहीं ; — क्योंकि धर्म-युक्त युद्ध से ; — क्षत्रिय के लिए अन्य कोई श्रेय नहीं

और अपने धर्म को देखते हुए भी तुम्हें विचलित होना उचित नहीं; क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्म-युक्त युद्ध से बढ़कर अन्य कोई श्रेय नहीं।