Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 18.49 / 78

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)18.49

18.49
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः । नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति ॥ १८-४९ ॥
asaktabuddhiḥ sarvatra jitātmā vigataspṛhaḥ | naiṣkarmyasiddhiṃ paramāṃ saṃnyāsenādhigacchati || 18-49 ||
— सर्वत्र अनासक्त बुद्धि वाला ; — आत्मविजयी, स्पृहारहित ; — परम नैष्कर्म्य-सिद्धि को ; — संन्यास से प्राप्त करता है

जिसकी बुद्धि सर्वत्र अनासक्त है, जिसने अपने को जीत लिया है, और जो स्पृहारहित है — वह संन्यास के द्वारा परम नैष्कर्म्य-सिद्धि को प्राप्त करता है।