असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः ।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति ॥
१८-४९ ॥
asaktabuddhiḥ sarvatra jitātmā vigataspṛhaḥ |
naiṣkarmyasiddhiṃ paramāṃ saṃnyāsenādhigacchati ||
18-49 ||
जिसकी बुद्धि सर्वत्र अनासक्त है, जिसने अपने को जीत लिया है, और जो स्पृहारहित है — वह संन्यास के द्वारा परम नैष्कर्म्य-सिद्धि को प्राप्त करता है।