Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 18.37 / 78

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)18.37

18.37
यत्तदात्त्वे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् । तत्सुखं सात्त्विकं विद्यादात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥ १८-३७ ॥
yattadāttve viṣamiva pariṇāme'mṛtopamam | tatsukhaṃ sāttvikaṃ vidyādātmabuddhiprasādajam || 18-37 ||
— जो आरम्भ में विष के समान ; — परिणाम में अमृत के समान ; — उस सुख को सात्त्विक जानना चाहिए ; — अपनी बुद्धि की प्रसन्नता से उत्पन्न

जो आरम्भ में विष के समान किन्तु परिणाम में अमृत के समान है — उस सुख को, जो अपनी बुद्धि की प्रसन्नता से उत्पन्न होता है, सात्त्विक जानना चाहिए।