यत्तदात्त्वे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् ।
तत्सुखं सात्त्विकं विद्यादात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥
१८-३७ ॥
yattadāttve viṣamiva pariṇāme'mṛtopamam |
tatsukhaṃ sāttvikaṃ vidyādātmabuddhiprasādajam ||
18-37 ||
जो आरम्भ में विष के समान किन्तु परिणाम में अमृत के समान है — उस सुख को, जो अपनी बुद्धि की प्रसन्नता से उत्पन्न होता है, सात्त्विक जानना चाहिए।