सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ ।
अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति ॥
१८-३६ ॥
sukhaṃ tvidānīṃ trividhaṃ śṛṇu me bharatarṣabha |
abhyāsādramate yatra duḥkhāntaṃ ca nigacchati ||
18-36 ||
हे भरतर्षभ, अब मुझसे त्रिविध सुख को सुन — जिसमें अभ्यास से मनुष्य रमता है और दुःख के अन्त को प्राप्त होता है।