Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 18.32 / 78

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)18.32

18.32
अधर्मं धर्ममिति या बुद्ध्यते तमसान्विता । सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा तामसी मता ॥ १८-३२ ॥
adharmaṃ dharmamiti yā buddhyate tamasānvitā | sarvārthānviparītāṃśca buddhiḥ sā tāmasī matā || 18-32 ||
— जो अधर्म को धर्म ऐसा ; — मानती है, तमस् से युक्त ; — और समस्त वस्तुओं को विपरीत ; — वह बुद्धि तामसी मानी गई

हे पार्थ, जो तमस् से युक्त बुद्धि अधर्म को धर्म मानती है और समस्त वस्तुओं को विपरीत (समझती है) — वह तामसी मानी गई है।