Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 18.31 / 78

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)18.31

18.31
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च । अयथावत् प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥ १८-३१ ॥
yayā dharmamadharmaṃ ca kāryaṃ cākāryameva ca | ayathāvat prajānāti buddhiḥ sā pārtha rājasī || 18-31 ||
— जिससे धर्म और अधर्म को ; — और कर्तव्य तथा अकर्तव्य को ; — अयथार्थ रूप से जानता है ; — वह बुद्धि, हे पार्थ, राजसी

हे पार्थ, जिस बुद्धि से मनुष्य धर्म और अधर्म को, तथा कर्तव्य और अकर्तव्य को अयथार्थ रूप से जानता है — वह राजसी है।