Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 18.28 / 78

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)18.28

18.28
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः । विषादी दीर्घसूत्रश्च कर्ता तामस उच्यते ॥ १८-२८ ॥
ayuktaḥ prākṛtaḥ stabdhaḥ śaṭho naiṣkṛtiko'lasaḥ | viṣādī dīrghasūtraśca kartā tāmasa ucyate || 18-28 ||
— अयुक्त (असंयमी), प्राकृत, अकड़ वाला ; — शठ (कपटी), दूसरों की जीविका नष्ट करने वाला, आलसी ; — विषादी और दीर्घसूत्री ; — कर्ता तामस कहलाता है

अयुक्त (असंयमी), प्राकृत (असंस्कृत), अकड़ वाला, शठ (कपटी), दूसरों की जीविका नष्ट करने वाला, आलसी, विषादी और दीर्घसूत्री कर्ता तामस कहलाता है।