Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 18.29 / 78

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)18.29

18.29
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु । प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय ॥ १८-२९ ॥
buddherbhedaṃ dhṛteścaiva guṇatastrividhaṃ śṛṇu | procyamānamaśeṣeṇa pṛthaktvena dhanañjaya || 18-29 ||
— बुद्धि के और धृति के भेद को भी ; — गुणों के अनुसार त्रिविध सुन ; — पूर्णतः कहे जा रहे ; — पृथक्-पृथक्, हे धनञ्जय

हे धनञ्जय, गुणों के अनुसार बुद्धि के और धृति के त्रिविध भेद को सुन, जो पूर्णतः और पृथक्-पृथक् कहा जा रहा है।