Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 18.22 / 78

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)18.22

18.22
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिनत्कार्ये सक्तमहेतुकम् । अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ॥ १८-२२ ॥
yattu kṛtsnavadekasminatkārye saktamahetukam | atattvārthavadalpaṃ ca tattāmasamudāhṛtam || 18-22 ||
— किन्तु जो एक ही कार्य में, मानो वह सब हो ; — आसक्त, हेतुरहित ; — तत्त्वार्थ से रहित और तुच्छ ; — वह तामस कहा गया

किन्तु जो (ज्ञान) एक ही कार्य में, मानो वह सब कुछ हो, ऐसी हेतुरहित आसक्ति वाला, तत्त्वार्थ से रहित और तुच्छ है — वह तामस कहा गया है।