Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 17.26 / 28

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)17.26

17.26
सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते । प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ गीयते ॥ १७-२६ ॥
sadbhāve sādhubhāve ca sadityetatprayujyate | praśaste karmaṇi tathā sacchabdaḥ pārtha gīyate || 17-26 ||
— सद्भाव (अस्तित्व) और साधुभाव में ; — 'सत्' यह प्रयुक्त होता है ; — वैसे ही प्रशस्त (शुभ) कर्म में ; — 'सत्' शब्द कहा जाता है, हे पार्थ

हे पार्थ, 'सत्' यह शब्द सद्भाव (अस्तित्व) और साधुभाव (सज्जनता) के अर्थ में प्रयुक्त होता है; वैसे ही प्रशस्त (शुभ) कर्म में भी 'सत्' शब्द कहा जाता है।