तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः ।
दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः ॥
१७-२५ ॥
tadityanabhisandhāya phalaṃ yajñatapaḥkriyāḥ |
dānakriyāśca vividhāḥ kriyante mokṣakāṅkṣibhiḥ ||
17-25 ||
'तत्' का उच्चारण करके और फल की इच्छा न करके मोक्ष की कामना करने वालों के द्वारा नाना प्रकार की यज्ञ, तप और दान की क्रियाएँ की जाती हैं।