Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 17.25 / 28

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)17.25

17.25
तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः । दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः ॥ १७-२५ ॥
tadityanabhisandhāya phalaṃ yajñatapaḥkriyāḥ | dānakriyāśca vividhāḥ kriyante mokṣakāṅkṣibhiḥ || 17-25 ||
— 'तत्' का (उच्चारण करके), फल की इच्छा न करके ; — यज्ञ-तप की क्रियाएँ ; — और नाना प्रकार की दान-क्रियाएँ ; — मोक्ष के इच्छुकों द्वारा की जाती हैं

'तत्' का उच्चारण करके और फल की इच्छा न करके मोक्ष की कामना करने वालों के द्वारा नाना प्रकार की यज्ञ, तप और दान की क्रियाएँ की जाती हैं।