Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 17.11 / 28

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)17.11

17.11
अफलाकांक्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते । यष्टव्यमित्येव मनः समाधाय स सात्त्विकः ॥ १७-११ ॥
aphalākāṃkṣibhiryajño vidhidṛṣṭo ya ijyate | yaṣṭavyamityeva manaḥ samādhāya sa sāttvikaḥ || 17-11 ||
— फल की इच्छा न रखने वालों द्वारा यज्ञ ; — विधि के अनुसार जो किया जाता है ; — 'यजन करना कर्तव्य है' ऐसा मन स्थिर करके ; — वह सात्त्विक

जो यज्ञ फल की इच्छा न रखने वालों के द्वारा, विधि के अनुसार, 'यजन करना ही कर्तव्य है' ऐसा मन को स्थिर करके किया जाता है — वह सात्त्विक है।