Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 17.10 / 28

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)17.10

17.10
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् । उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ॥ १७-१० ॥
yātayāmaṃ gatarasaṃ pūti paryuṣitaṃ ca yat | ucchiṣṭamapi cāmedhyaṃ bhojanaṃ tāmasapriyam || 17-10 ||
— अधिक देर का रखा, रस-रहित, सड़ा ; — और बासी जो ; — जूठा और अपवित्र भी ; — भोजन तामस को प्रिय

जो अधिक देर का रखा हुआ, रस-रहित, सड़ा हुआ और बासी है, तथा जूठा और अपवित्र भोजन है — वह तामस को प्रिय है।