Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 10.28 / 42

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)10.28

10.28
आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् । प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः ॥ १०-२८ ॥
āyudhānāmahaṃ vajraṃ dhenūnāmasmi kāmadhuk | prajanaścāsmi kandarpaḥ sarpāṇāmasmi vāsukiḥ || 10-28 ||
— आयुधों में मैं वज्र ; — गायों में कामधेनु हूँ ; — उत्पादक कन्दर्प (कामदेव) हूँ ; — सर्पों में वासुकि हूँ

आयुधों में मैं वज्र हूँ, गायों में कामधेनु हूँ; मैं उत्पादक कन्दर्प (कामदेव) हूँ, और सर्पों में वासुकि हूँ।