Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 10.2 / 42

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)10.2

10.2
न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः । अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः ॥ १०-२ ॥
na me viduḥ suragaṇāḥ prabhavaṃ na maharṣayaḥ | ahamādirhi devānāṃ maharṣīṇāṃ ca sarvaśaḥ || 10-2 ||
— न देवगण मेरे जानते हैं ; — उद्गम को, न महर्षि ; — क्योंकि मैं देवताओं का आदि ; — और महर्षियों का सब प्रकार से

न देवगण मेरे उद्गम को जानते हैं, न महर्षि; क्योंकि मैं देवताओं और महर्षियों का सब प्रकार से आदि हूँ।