Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 10.3 / 42

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)10.3

10.3
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् । असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ १०-३ ॥
yo māmajamanādiṃ ca vetti lokamaheśvaram | asammūḍhaḥ sa martyeṣu sarvapāpaiḥ pramucyate || 10-3 ||
— जो मुझे अज और अनादि ; — लोकों का महान् ईश्वर जानता है ; — मोहरहित वह मनुष्यों में ; — समस्त पापों से मुक्त होता है

जो मुझे अज, अनादि, और लोकों का महान् ईश्वर जानता है, वह मनुष्यों में मोहरहित होकर समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।