Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 10.1 / 42

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)10.1

10.1
भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः । यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया ॥ १०-१ ॥
bhūya eva mahābāho śṛṇu me paramaṃ vacaḥ | yatte'haṃ prīyamāṇāya vakṣyāmi hitakāmyayā || 10-1 ||
— फिर से, हे महाबाहु ; — मेरे परम वचन को सुन ; — जिसे मैं तुझ प्रिय से ; — कहूँगा, तेरे हित की कामना से

हे महाबाहु, फिर मेरे परम वचन को सुन, जिसे मैं तुझ प्रिय (मुझमें प्रीति रखने वाले) से तेरे हित की कामना से कहूँगा।