The Great Liberation Tantra· 3.5 / 153

The Great Liberation Tantra3.5

3.5
रहस्यमेतत् कल्याणि न कुत्रापि प्रकाशितम् । तव स्नेहेन वक्ष्यामि मम प्राणाधिकं परम् ॥५॥
rahasyametat kalyāṇi na kutrāpi prakāśitam | tava snehena vakṣyāmi mama prāṇādhikaṃ param ||5||
— रहस्य ; — यह ; — हे कल्याणि ; — नहीं ; — कहीं भी ; — प्रकाशित ; — तुम्हारे ; — स्नेह से ; — कहूँगा ; — मेरे ; — प्राण से भी अधिक प्रिय ; — परम को

हे कल्याणि, यह रहस्य कहीं भी प्रकाशित नहीं हुआ; तुम्हारे स्नेह से मैं इस परम (रहस्य) को — जो मुझे प्राण से भी अधिक प्रिय है — कहूँगा।