The Great Liberation Tantra· 2.52 / 54

The Great Liberation Tantra2.52

2.52
बहुनाऽत्र किमुक्तेन तवाऽग्रे कथ्यते प्रिये । ध्येयः पूज्यः सुखाराध्यस्तं विना नास्ति मुक्तये ॥५२॥
bahunā'tra kimuktena tavā'gre kathyate priye | dhyeyaḥ pūjyaḥ sukhārādhyastaṃ vinā nāsti muktaye ||52||
— बहुत से ; — यहाँ ; — कहने से क्या ; — तुम्हारे समक्ष ; — कहा जाता है ; — हे प्रिये ; — ध्येय ; — पूज्य ; — सुखपूर्वक आराध्य ; — उसे ; — बिना ; — नहीं है ; — मुक्ति के लिए

हे प्रिये, यहाँ बहुत कहने से क्या? तुम्हारे समक्ष कहता हूँ: वही ध्येय, पूज्य, और सुखपूर्वक आराध्य है; उसके बिना मुक्ति के लिए (कोई उपाय) नहीं है।