Vijñāna Bhairava Tantra · 1.31

Vijñāna Bhairava Tantra 1.31

1.31
कररुद्धदृगस्त्रेण भ्रूभेदाद्द्वाररोधनात् । दृष्टे बिन्दौ क्रमाल्लीने तन्मध्ये परमा स्थितिः ॥३१॥
kararuddhadṛgastreṇa bhrūbhedād dvārarodhanāt | dṛṣṭe bindau kramāl līne tanmadhye paramā sthitiḥ
anuṣṭubh
— हाथ से दृष्टि (इन्द्रिय-द्वारों) को रोकने रूपी अस्त्र से (करण कारक — समासगत) ; — भौंहों के मध्य भेद करने से (अपादान कारक — समासगत) ; — (सब) द्वारों को रोकने से (अपादान कारक — समासगत) ; — बिन्दु के दृष्ट होने पर (सति-सप्तमी) ; — क्रमशः लीन होने पर (सति-सप्तमी) ; — उसके मध्य में (अधिकरण कारक — समासगत) ; — परम स्थिति (कर्ता कारक)

हाथ-रूपी अस्त्र से दृष्टि (इन्द्रिय-द्वारों) को रोककर, भौंहों के मध्य भेद करके और (सब) द्वारों को रोकने से — जब बिन्दु दिखाई दे और क्रमशः वह लीन हो जाए, तब उसके मध्य में परम स्थिति (प्राप्त होती है)। (धारणा १३)