— हाथ से दृष्टि (इन्द्रिय-द्वारों) को रोकने रूपी अस्त्र से (करण कारक — समासगत); — भौंहों के मध्य भेद करने से (अपादान कारक — समासगत); — (सब) द्वारों को रोकने से (अपादान कारक — समासगत); — बिन्दु के दृष्ट होने पर (सति-सप्तमी); — क्रमशः लीन होने पर (सति-सप्तमी); — उसके मध्य में (अधिकरण कारक — समासगत); — परम स्थिति (कर्ता कारक)
हाथ-रूपी अस्त्र से दृष्टि (इन्द्रिय-द्वारों) को रोककर, भौंहों के मध्य भेद करके और (सब) द्वारों को रोकने से — जब बिन्दु दिखाई दे और क्रमशः वह लीन हो जाए, तब उसके मध्य में परम स्थिति (प्राप्त होती है)। (धारणा १३)