Vijñāna Bhairava Tantra · 1.32

Vijñāna Bhairava Tantra 1.32

1.32
धामान्तःक्षोभसम्भूतसूक्ष्माग्नितिलकाकृतिम् । बिन्दुं शिखान्ते हृदये लयान्ते ध्यायतो लयः ॥३२॥
dhāmāntaḥkṣobhasambhūtasūkṣmāgnitilakākṛtim | binduṃ śikhānte hṛdaye layānte dhyāyato layaḥ
anuṣṭubh
— अन्तर-धाम (हृदय-स्थान) के क्षोभ से उत्पन्न (समासगत विशेषण) ; — सूक्ष्म अग्नि-तिलक के आकार वाले (समासगत विशेषण) ; — बिन्दु को (कर्म कारक) ; — शिखा के अन्त में (अधिकरण — समासगत) ; — हृदय में (अधिकरण कारक) ; — लय के अन्त में (अधिकरण — समासगत) ; — ध्यान करने वाले को (षष्ठी/सम्प्रदान) ; — लय, विलय (कर्ता कारक)

अन्तर-धाम (हृदय-स्थान) के क्षोभ से उत्पन्न सूक्ष्म अग्नि-तिलक के आकार वाले बिन्दु को शिखा के अन्त में, हृदय में ध्यान करने वाले को लय के अन्त में लय (परम विलय) प्राप्त होता है। (धारणा १४)