Vijñāna Bhairava Tantra · 1.33

Vijñāna Bhairava Tantra 1.33

1.33
अनाहते पात्रकर्णेऽभग्नशब्दे सरिद्द्रुते । शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥३३॥
anāhate pātrakarṇe'bhagnaśabde sariddrute | śabdabrahmaṇi niṣṇātaḥ paraṃ brahmādhigacchati
anuṣṭubh
— अनाहत (अनस्त्रक नाद) में (अधिकरण कारक) ; — पात्र-सदृश कान में (अधिकरण कारक — समासगत) ; — अभग्न (अखण्ड) शब्द में (अधिकरण — समासगत) ; — नदी-प्रवाह के समान बहते हुए (समासगत विशेषण) ; — शब्द-ब्रह्म में (अधिकरण — समासगत) ; — निष्णात, मग्न (कर्ता कारक) ; — परम ब्रह्म को (कर्म कारक) ; — प्राप्त करता है (वर्तमान काल)

अनाहत (अनस्त्रक नाद) में, पात्र-सदृश कान में, अभग्न (अखण्ड) शब्द में, नदी-प्रवाह के समान बहते हुए शब्द-ब्रह्म में जो निष्णात (मग्न) हो जाता है — वह परब्रह्म को प्राप्त करता है। (धारणा १५)