Vijñāna Bhairava Tantra · 1.34

Vijñāna Bhairava Tantra 1.34

1.34
प्रणवादिसमुच्चारात्प्लुतान्ते शून्यभावनात् । शून्यया परया शक्त्या शून्यतामेति भैरवि ॥३४॥
praṇavādisamuccārāt plutānte śūnyabhāvanāt | śūnyayā parayā śaktyā śūnyatām eti bhairavi
anuṣṭubh
— प्रणव (ॐ) आदि के उच्चारण से (अपादान — समासगत) ; — प्लुत (दीर्घतर) अन्त में (अधिकरण — समासगत) ; — शून्य की भावना से (अपादान — समासगत) ; — शून्या, परा शक्ति के द्वारा (करण कारक स्त्रीलिङ्ग) ; — शून्यता को प्राप्त होता है (कर्म कारक + क्रिया) ; — हे भैरवि! (सम्बोधन)

हे भैरवि! ॐ (प्रणव) आदि का उच्चारण करते हुए, प्लुत (दीर्घतर) अन्त में शून्य की भावना से — शून्या परा शक्ति के द्वारा साधक शून्यता को प्राप्त होता है। (धारणा १६)