Vijñāna Bhairava Tantra · 1.35

Vijñāna Bhairava Tantra 1.35

1.35
यस्य कस्यापि वर्णस्य पूर्वान्तावनुभावयेत् । शून्यया शून्यभूतोऽसौ शून्याकारः पुमान्भवेत् ॥३५॥
yasya kasyāpi varṇasya pūrvāntāv anubhāvayet | śūnyayā śūnyabhūto'sau śūnyākāraḥ pumān bhavet
anuṣṭubh
— किसी भी वर्ण (अक्षर) के (षष्ठी एकवचन) ; — पूर्व और अन्त (आरम्भ-समाप्ति) — कर्म कारक द्विवचन ; — अनुभव करे (विधि लिङ् — णिजन्त) ; — शून्य से, शून्यता के द्वारा (करण कारक स्त्रीलिङ्ग) ; — वह शून्य-भूत होकर (कर्ता कारक) ; — शून्याकार पुरुष हो जाता है (कर्ता कारक + विधि लिङ्)

किसी भी वर्ण (अक्षर) के पूर्व (आरम्भ) और अन्त (समाप्ति) — दोनों का अनुभव करे; उस शून्य (मध्य) के द्वारा वह स्वयं शून्य-भूत होकर शून्याकार पुरुष हो जाता है। (धारणा १७)