— किसी भी वर्ण (अक्षर) के (षष्ठी एकवचन); — पूर्व और अन्त (आरम्भ-समाप्ति) — कर्म कारक द्विवचन; — अनुभव करे (विधि लिङ् — णिजन्त); — शून्य से, शून्यता के द्वारा (करण कारक स्त्रीलिङ्ग); — वह शून्य-भूत होकर (कर्ता कारक); — शून्याकार पुरुष हो जाता है (कर्ता कारक + विधि लिङ्)
किसी भी वर्ण (अक्षर) के पूर्व (आरम्भ) और अन्त (समाप्ति) — दोनों का अनुभव करे; उस शून्य (मध्य) के द्वारा वह स्वयं शून्य-भूत होकर शून्याकार पुरुष हो जाता है। (धारणा १७)