— वीणा आदि वाद्यों की ध्वनियों में (अधिकरण — समासगत); — दीर्घ (अधिकरण — विशेषण); — क्रम से स्थित रहने के कारण (अपादान — समासगत); — अनन्य-चित्त, एकाग्र-चित्त (विशेषण — समासगत); — (नाद के) अन्त में (अधिकरण कारक); — पर-व्योम-वपु (परम आकाश-स्वरूप) हो जाता है — कर्ता कारक
वीणा आदि वाद्यों की दीर्घ ध्वनियों में क्रम से स्थिर होकर, अनन्य-चित्त (एकाग्र-चित्त) साधक उनके (नाद के) अन्त में पर-व्योम (परम आकाश) रूपी वपु (स्वरूप) वाला हो जाता है। (धारणा १८)