Vijñāna Bhairava Tantra · 1.36

Vijñāna Bhairava Tantra 1.36

1.36
तन्त्र्यादिवाद्यशब्देषु दीर्घेषु क्रमसंस्थितेः । अनन्यचेताः प्रत्यन्ते परव्योमवपुर्भवेत् ॥३६॥
tantryādivādyaśabdeṣu dīrgheṣu kramasaṃsthiteḥ | ananyacetāḥ pratyante paravyomavapur bhavet
anuṣṭubh
— वीणा आदि वाद्यों की ध्वनियों में (अधिकरण — समासगत) ; — दीर्घ (अधिकरण — विशेषण) ; — क्रम से स्थित रहने के कारण (अपादान — समासगत) ; — अनन्य-चित्त, एकाग्र-चित्त (विशेषण — समासगत) ; — (नाद के) अन्त में (अधिकरण कारक) ; — पर-व्योम-वपु (परम आकाश-स्वरूप) हो जाता है — कर्ता कारक

वीणा आदि वाद्यों की दीर्घ ध्वनियों में क्रम से स्थिर होकर, अनन्य-चित्त (एकाग्र-चित्त) साधक उनके (नाद के) अन्त में पर-व्योम (परम आकाश) रूपी वपु (स्वरूप) वाला हो जाता है। (धारणा १८)