piṇḍamantrasya sarvasya sthūlavarṇakrameṇa tu |
ardhendubindunādāntaḥ śūnyoccārād bhavec chivaḥ
anuṣṭubh
— पिण्ड-मन्त्र (बीज-मन्त्र) के (षष्ठी — समासगत); — सबके, समस्त (षष्ठी एकवचन); — स्थूल वर्ण-क्रम से ही (करण कारक — समासगत); — अर्धचन्द्र, बिन्दु, नाद के अन्त में (मौन में) — कर्ता/अधिकरण — समासगत; — शून्य उच्चार से (अपादान — समासगत); — शिव हो जाता है (विधि लिङ्)
किसी भी पिण्ड-मन्त्र (बीज-मन्त्र) के स्थूल वर्ण-क्रम से उच्चारण के बाद अर्धचन्द्र, बिन्दु और नाद के अन्त में — शून्य उच्चार (मौन-उच्चार) से साधक शिव हो जाता है। (धारणा १९)