Vijñāna Bhairava Tantra · 1.37

Vijñāna Bhairava Tantra 1.37

1.37
पिण्डमन्त्रस्य सर्वस्य स्थूलवर्णक्रमेण तु । अर्धेन्दुबिन्दुनादान्तः शून्योच्चाराद्भवेच्छिवः ॥३७॥
piṇḍamantrasya sarvasya sthūlavarṇakrameṇa tu | ardhendubindunādāntaḥ śūnyoccārād bhavec chivaḥ
anuṣṭubh
— पिण्ड-मन्त्र (बीज-मन्त्र) के (षष्ठी — समासगत) ; — सबके, समस्त (षष्ठी एकवचन) ; — स्थूल वर्ण-क्रम से ही (करण कारक — समासगत) ; — अर्धचन्द्र, बिन्दु, नाद के अन्त में (मौन में) — कर्ता/अधिकरण — समासगत ; — शून्य उच्चार से (अपादान — समासगत) ; — शिव हो जाता है (विधि लिङ्)

किसी भी पिण्ड-मन्त्र (बीज-मन्त्र) के स्थूल वर्ण-क्रम से उच्चारण के बाद अर्धचन्द्र, बिन्दु और नाद के अन्त में — शून्य उच्चार (मौन-उच्चार) से साधक शिव हो जाता है। (धारणा १९)