Vijñāna Bhairava Tantra · 1.30

Vijñāna Bhairava Tantra 1.30

1.30
मध्यनाडी मध्यसंस्था बिससूत्राभरूपया । ध्यातान्तर्व्योमया देव्या तया देवः प्रकाशते ॥३०॥
madhyanāḍī madhyasaṃsthā bisasūtrābharūpayā | dhyātāntarvyomayā devyā tayā devaḥ prakāśate
anuṣṭubh
— मध्य नाडी (सुषुम्ना) — कर्ता कारक ; — मध्य में स्थित (समासगत विशेषण) ; — कमल-नाल के तन्तु के समान (सूक्ष्म) रूप वाली (समासगत विशेषण) ; — ध्यान की हुई, ध्यायी जाती हुई (कर्मवाच्य भूत कृदन्त) ; — अन्तर-व्योम (हृदय-आकाश) से युक्त (समासगत विशेषण) ; — देवी के द्वारा (करण कारक) ; — उसी से, उसके द्वारा (करण कारक) ; — देव (शिव) — कर्ता कारक ; — प्रकाशित होता है (कर्मवाच्य वर्तमान)

मध्य नाडी (सुषुम्ना) मध्य में स्थित है — कमल-नाल के तन्तु के समान (सूक्ष्म) रूप वाली, अन्तर-व्योम (हृदय-आकाश) से युक्त — उस देवी के रूप में ध्यान करने पर उसी के द्वारा देव (शिव) प्रकाशित होते हैं। (धारणा १२)