Vijñāna Bhairava Tantra · 1.29

Vijñāna Bhairava Tantra 1.29

1.29
कपालान्तर्मनो न्यस्य तिष्ठन्मीलितलोचनः । क्रमेण मनसो दार्ढ्यात्लक्षयेल्लक्ष्यमुत्तमम् ॥२९॥
kapālāntar mano nyasya tiṣṭhan mīlitalocanaḥ | krameṇa manaso dārḍhyāt lakṣayel lakṣyam uttamam
anuṣṭubh
— कपाल के भीतर, मस्तक के मध्य में (अधिकरण कारक — समासगत) ; — मन को रखकर, स्थापित करके (क्त्वान्त) ; — स्थित रहकर, रहते हुए (वर्तमान कृदन्त) ; — आँखें मूँदे हुए (समासगत विशेषण) ; — क्रमशः, धीरे-धीरे (अव्यय) ; — मन की दृढ़ता से (अपादान — समासगत) ; — देखे, लक्ष्य करे (विधि लिङ्) ; — उत्तम लक्ष्य (परम तत्त्व) को — कर्म कारक

कपाल के भीतर (मस्तक के मध्य) मन को न्यस्त (स्थापित) करके, आँखें मूँदकर स्थित रहे; मन की दृढ़ता से क्रमशः उत्तम लक्ष्य (परम तत्त्व) को देखे। (धारणा ११)