Vijñāna Bhairava Tantra · 1.28

Vijñāna Bhairava Tantra 1.28

1.28
ईदृशेन क्रमेणैव यत्र कुत्रापि चिन्तना । शून्ये कुड्ये परे पात्रे स्वयं लीना वरप्रदा ॥२८॥
īdṛśena krameṇaiva yatra kutrāpi cintanā | śūnye kuḍye pare pātre svayaṃ līnā varapradā
anuṣṭubh
— इस प्रकार के क्रम से (करण कारक) ; — ही, मात्र (निश्चयार्थ अव्यय) ; — जहाँ कहीं भी (सम्बन्धवाचक अव्यय) ; — चिन्तना, ध्यान (कर्ता कारक) ; — शून्य में (अधिकरण कारक) ; — दीवार पर (अधिकरण कारक) ; — किसी पर (परम) वस्तु पर (अधिकरण कारक) ; — किसी पात्र (बर्तन) में (अधिकरण कारक) ; — स्वयं लीन हो जाता है (कर्ता कारक स्त्रीलिङ्ग — मन) ; — वर-प्रदा, वरदान देने वाली (विशेषण स्त्रीलिङ्ग)

इसी प्रकार के क्रम से — जहाँ कहीं भी चिन्तना हो — चाहे शून्य में, दीवार पर, किसी पर (परम पात्र) पर, या किसी पात्र पर — (मन) स्वयं लीन हो जाता है; यह (विधि) वर-प्रदा (वरदान देने वाली) है। (धारणा १०)