Vijñāna Bhairava Tantra · 1.27

Vijñāna Bhairava Tantra 1.27

1.27
शिखिपक्षैश्चित्ररूपैर्मण्डलैः शून्यपञ्चकम् । ध्यायतोऽनुत्तरे शून्ये प्रवेशो हृदये भवेत् ॥२७॥
śikhipakṣaiś citrarūpair maṇḍalaiḥ śūnyapañcakam | dhyāyato'nuttare śūnye praveśo hṛdaye bhavet
anuṣṭubh
— मोर के पंखों के द्वारा (करण कारक — समासगत) ; — विचित्र (अनेक-वर्ण) रूप वाले (समासगत विशेषण) ; — मण्डलों के द्वारा (करण कारक बहुवचन) ; — पञ्च-शून्य — पाँच शून्यों का समूह (कर्म कारक — समासगत) ; — ध्यान करने वाले का (षष्ठी एकवचन) ; — अनुत्तर (परम, सर्वोच्च) में — अधिकरण कारक ; — शून्य में (अधिकरण कारक) ; — प्रवेश (कर्ता कारक) ; — हृदय में (अधिकरण कारक) ; — हो जाए (विधि लिङ्)

मोर के पंखों के विचित्र मण्डलों के समान (पञ्च-वर्णों वाले) पञ्च-शून्यों का ध्यान करते हुए (साधक का) अनुत्तर-शून्य में, हृदय में प्रवेश हो जाता है। (धारणा ९)