Vijñāna Bhairava Tantra · 1.26

Vijñāna Bhairava Tantra 1.26

1.26
तयापूर्याशु मूर्धान्तं भङ्क्त्वा भ्रूक्षेपसेतुना । निर्विकल्पं मनः कृत्वा सर्वोर्ध्वे सर्वगोद्गमः ॥२६॥
tayāpūryāśu mūrdhāntaṃ bhaṅktvā bhrūkṣepasetunā | nirvikalpaṃ manaḥ kṛtvā sarvordhve sarvagodgamaḥ
anuṣṭubh
— उस (उठती शक्ति) के द्वारा (करण कारक) ; — भरकर, पूर्ण करके (क्त्वान्त) ; — शीघ्र, तुरन्त (अव्यय) ; — मूर्धा के अन्त तक, शिर के अग्र भाग तक (अव्ययीभाव) ; — भेदकर, तोड़कर (क्त्वान्त) ; — भौंहों को उठाने रूपी सेतु से (करण कारक — समासगत) ; — निर्विकल्प, विचार-शून्य (विशेषण) ; — मन को करके (क्त्वान्त) ; — सर्वोपरि (अधिकरण कारक — समासगत) ; — सर्वग (शिव) का उद्गम (कर्ता कारक — समासगत)

उस (शक्ति) से शीघ्र मूर्धा-पर्यन्त (शिर के अग्र भाग तक) पूर्ण करके, भ्रू-क्षेप-सेतु (भौंहों को उठाने रूपी सेतु) से (ब्रह्मरन्ध्र को) भेदकर, मन को निर्विकल्प करके — सर्वोपरि (परम) में सर्वग (शिव) का उद्गम होता है। (धारणा ८)