Vijñāna Bhairava Tantra · 1.25

Vijñāna Bhairava Tantra 1.25

1.25
क्रमद्वादशकं सम्यग्द्वादशाक्षरभेदितम् । स्थूलसूक्ष्मपरस्थित्या मुक्त्वा मुक्त्वान्ततः शिवः ॥२५॥
kramadvādaśakaṃ samyag dvādaśākṣarabheditam | sthūlasūkṣmaparasthityā muktvā muktvāntataḥ śivaḥ
anuṣṭubh
— बारह स्थानों का क्रम (कर्म कारक — समासगत) ; — सम्यक् रूप से, ठीक से (अव्यय) ; — बारह अक्षरों से भेदित, विभक्त (समासगत विशेषण) ; — स्थूल, सूक्ष्म और पर (परम) — इन तीन अवस्थाओं से (करण कारक — समासगत) ; — छोड़ते-छोड़ते (पुनरुक्त क्त्वान्त) ; — अन्त में (अव्यय) ; — शिव (कर्ता कारक — प्राप्त होते हैं)

बारह स्थानों के क्रम को सम्यक् रूप से बारह अक्षरों से भेदित करके — स्थूल, सूक्ष्म और पर अवस्था के द्वारा (प्रत्येक को) क्रमशः छोड़ते-छोड़ते अन्ततः शिव (प्राप्त होते हैं)। (धारणा ७)