Vijñāna Bhairava Tantra · 1.24

Vijñāna Bhairava Tantra 1.24

1.24
उद्गच्छन्तीं तडिद्रूपां प्रतिचक्रं क्रमात्क्रमम् । ऊर्ध्वं मुष्टित्रयावधि यावत्तद्भैरवोदयः ॥२४॥
udgacchantīṃ taḍidrūpāṃ praticakraṃ kramāt kramam | ūrdhvaṃ muṣṭitrayāvadhi yāvat tad bhairavodayaḥ
anuṣṭubh
— ऊपर उठती हुई (वर्तमान कृदन्त) ; — विद्युत्-स्वरूप वाली (समासगत विशेषण) ; — प्रत्येक चक्र में (अव्ययीभाव) ; — क्रम-क्रम से, क्रमशः (अव्यय) ; — ऊपर की ओर (अव्यय) ; — तीन मुष्टि (मुट्ठी-प्रमाण) की सीमा तक — समासगत अव्यय ; — जब तक (अव्यय) ; — वही भैरव-उदय है (कर्ता कारक — समासगत)

विद्युत्-रूपा (शक्ति को) प्रत्येक चक्र में क्रमशः ऊपर उठती हुई, तीन मुष्टि (मुट्ठी-प्रमाण) की सीमा तक — जब तक उठती जाए — (ध्यान करे); वही भैरव का उदय है। (धारणा ६)