इन्द्रजालमयं विश्वं व्यस्तं वा चित्रकर्मवत् ।
भ्रमद्वा ध्यायतः सर्वं पश्यतश्च सुखोदयः ॥१३७॥
indrajālamayaṃ viśvaṃ vyastaṃ vā citrakarmavat |
bhramadvā dhyāyataḥ sarvaṃ paśyataś ca sukhodayaḥ
anuṣṭubh
[पुनरुक्ति — श्लोक ८५] विश्व को इन्द्रजाल-मय, चित्र-कर्म-सदृश, भ्रमते हुए के रूप में ध्यान और दर्शन करने वाले को सुख का उदय होता है।