Vijñāna Bhairava Tantra · 1.138

Vijñāna Bhairava Tantra 1.138

1.138
न चित्तं निक्षिपेद्दुःखे न सुखे वा परिक्षिपेत् । भैरवि ज्ञायतां मध्ये किं तत्त्वमवशिष्यते ॥१३८॥
na cittaṃ nikṣiped duḥkhe na sukhe vā parikṣipet | bhairavi jñāyatāṃ madhye kiṃ tattvam avaśiṣyate
anuṣṭubh
— मध्य में (अधिकरण कारक) ; — शेष रहता है (कर्मवाच्य वर्तमान) ; — जाना जाए (कर्मवाच्य आज्ञार्थ)

[पुनरुक्ति — श्लोक ८६] चित्त को न दुःख में डाले, न सुख में परिक्षेप करे; हे भैरवि, मध्य में जानने पर — क्या तत्त्व शेष रहता है?