न चित्तं निक्षिपेद्दुःखे न सुखे वा परिक्षिपेत् ।
भैरवि ज्ञायतां मध्ये किं तत्त्वमवशिष्यते ॥१३८॥
na cittaṃ nikṣiped duḥkhe na sukhe vā parikṣipet |
bhairavi jñāyatāṃ madhye kiṃ tattvam avaśiṣyate
anuṣṭubh
[पुनरुक्ति — श्लोक ८६] चित्त को न दुःख में डाले, न सुख में परिक्षेप करे; हे भैरवि, मध्य में जानने पर — क्या तत्त्व शेष रहता है?