Vijñāna Bhairava Tantra · 1.139

Vijñāna Bhairava Tantra 1.139

1.139
विहाय निजदेहास्थां सर्वत्रास्मीति भावयन् । दृढेन मनसा दृष्ट्या नान्येक्षिण्या सुखी भवेत् ॥१३९॥
vihāya nijadehāsthāṃ sarvatrāsmīti bhāvayan | dṛḍhena manasā dṛṣṭyā nānyekṣiṇyā sukhī bhavet
anuṣṭubh
— अपने देह की आस्था को (कर्म कारक — समासगत) ; — मैं सर्वत्र हूँ (अव्यय + वर्तमान उत्तम पुरुष) ; — अन्य कुछ न देखने वाली दृष्टि से (करण — समासगत)

[पुनरुक्ति — श्लोक ८७] अपने देह की आस्था छोड़कर 'मैं सर्वत्र हूँ' ऐसी दृढ़ मन से भावना करता हुआ, अन्य कुछ न देखने वाली दृष्टि से सुखी हो जाता है।