विहाय निजदेहास्थां सर्वत्रास्मीति भावयन् ।
दृढेन मनसा दृष्ट्या नान्येक्षिण्या सुखी भवेत् ॥१३९॥
vihāya nijadehāsthāṃ sarvatrāsmīti bhāvayan |
dṛḍhena manasā dṛṣṭyā nānyekṣiṇyā sukhī bhavet
anuṣṭubh
[पुनरुक्ति — श्लोक ८७] अपने देह की आस्था छोड़कर 'मैं सर्वत्र हूँ' ऐसी दृढ़ मन से भावना करता हुआ, अन्य कुछ न देखने वाली दृष्टि से सुखी हो जाता है।