Vijñāna Bhairava Tantra · 1.140

Vijñāna Bhairava Tantra 1.140

1.140
घटादौ यच्च विज्ञानमिच्छाद्यं वा ममान्तरे । नैव सर्वगतं जातं भावयन्निति सर्वगः ॥१४०॥
ghaṭādau yac ca vijñānam icchādyaṃ vā mamāntare | naiva sarvagataṃ jātaṃ bhāvayann iti sarvagaḥ
anuṣṭubh
— घट आदि में (अधिकरण — समासगत) ; — विज्ञान, ज्ञान (कर्ता कारक) ; — सर्वग, सर्वव्यापी (कर्ता कारक — समासगत)

[पुनरुक्ति — श्लोक ८८] घट आदि में जो विज्ञान या मेरे भीतर इच्छा आदि है, वह सर्व-गत ही नहीं हुआ है — ऐसी भावना करने वाला सर्वग हो जाता है।