घटादौ यच्च विज्ञानमिच्छाद्यं वा ममान्तरे ।
नैव सर्वगतं जातं भावयन्निति सर्वगः ॥१४०॥
ghaṭādau yac ca vijñānam icchādyaṃ vā mamāntare |
naiva sarvagataṃ jātaṃ bhāvayann iti sarvagaḥ
anuṣṭubh
[पुनरुक्ति — श्लोक ८८] घट आदि में जो विज्ञान या मेरे भीतर इच्छा आदि है, वह सर्व-गत ही नहीं हुआ है — ऐसी भावना करने वाला सर्वग हो जाता है।