Vijñāna Bhairava Tantra · 1.141

Vijñāna Bhairava Tantra 1.141

1.141
ग्राह्यग्राहकसंवित्तिः सामान्या सर्वदेहिनाम् । योगिनां तु विशेषोऽस्ति सम्बन्धे सावधानता ॥१४१॥
grāhyagrāhakasaṃvittiḥ sāmānyā sarvadehinām | yogināṃ tu viśeṣo'sti sambandhe sāvadhānatā
anuṣṭubh
— ग्राह्य-ग्राहक का संवित् (कर्ता कारक — समासगत) ; — सामान्य, समान (विशेषण) ; — सावधानता, सजगता (कर्ता कारक)

[पुनरुक्ति — श्लोक ८९] ग्राह्य-ग्राहक का संवित् सब देहियों में समान है; किन्तु योगियों का विशेष (अन्तर) है — सम्बन्ध में सावधानता।