Vijñāna Bhairava Tantra · 1.142

Vijñāna Bhairava Tantra 1.142

1.142
स्ववदन्यशरीरेऽपि संवित्तिमनुभावयेत् । अपेक्षां स्वशरीरस्य त्यक्त्वा व्यापी दिनैर्भवेत् ॥१४२॥
svavad anyaśarīre'pi saṃvittim anubhāvayet | apekṣāṃ svaśarīrasya tyaktvā vyāpī dinair bhavet
anuṣṭubh
— अपने (शरीर) के समान (अव्यय) ; — दूसरे के शरीर में (अधिकरण — समासगत) ; — व्यापी, सर्वव्यापी (कर्ता कारक)

[पुनरुक्ति — श्लोक ९०] अपने (शरीर) के समान दूसरे के शरीर में भी संवित् का अनुभव करे; अपने शरीर की अपेक्षा छोड़कर कुछ दिनों में व्यापी हो जाता है।