Vijñāna Bhairava Tantra · 1.143

Vijñāna Bhairava Tantra 1.143

1.143
निराधारं मनः कृत्वा विकल्पान्न विकल्पयेत् । तदात्मपरमात्मत्वे भैरवो मृगलोचने ॥१४३॥
nirādhāraṃ manaḥ kṛtvā vikalpān na vikalpayet | tadātmaparamātmatve bhairavo mṛgalocane
anuṣṭubh
— निराधार मन (कर्म कारक) ; — विकल्प की रचना करे (विधि लिङ् — णिजन्त) ; — आत्म-परमात्म-भाव में, स्व-परमात्म-तदात्म्य में (अधिकरण — समासगत)

[पुनरुक्ति — श्लोक ९१] मन को निराधार करके विकल्पों की रचना न करे; तब आत्म-परमात्म-भाव में भैरव (का साक्षात्कार), हे मृगनयनी।