Vijñāna Bhairava Tantra · 1.129

Vijñāna Bhairava Tantra 1.129

1.129
चित्ताद्यन्तःकृतिर्नास्ति ममान्तर्भावयेदिति । विकल्पानामभावेन विकल्पैरुज्झितो भवेत् ॥१२९॥
cittādyantaḥkṛtir nāsti mamāntar bhāvayed iti | vikalpānām abhāvena vikalpair ujjhito bhavet
anuṣṭubh
— अन्तःकरण, अन्तर-कृति (कर्ता कारक) ; — विकल्पों के अभाव से (अपादान — समासगत) ; — त्यक्त, मुक्त, छोड़ दिया गया (कर्मवाच्य भूत कृदन्त)

[पुनरुक्ति — श्लोक ७७] 'मेरे भीतर चित्त आदि अन्तःकरण है ही नहीं' — ऐसी भावना करे; विकल्पों के अभाव से विकल्पों से रहित हो जाए।