चित्ताद्यन्तःकृतिर्नास्ति ममान्तर्भावयेदिति ।
विकल्पानामभावेन विकल्पैरुज्झितो भवेत् ॥१२९॥
cittādyantaḥkṛtir nāsti mamāntar bhāvayed iti |
vikalpānām abhāvena vikalpair ujjhito bhavet
anuṣṭubh
[पुनरुक्ति — श्लोक ७७] 'मेरे भीतर चित्त आदि अन्तःकरण है ही नहीं' — ऐसी भावना करे; विकल्पों के अभाव से विकल्पों से रहित हो जाए।