Vijñāna Bhairava Tantra · 1.128

Vijñāna Bhairava Tantra 1.128

1.128
किञ्चिदङ्गं विभिद्यादौ तीक्ष्णसूच्यादिना ततः । तत्रैव चेतनां युक्त्वा भैरवे निर्मला गतिः ॥१२८॥
kiñcidaṅgaṃ vibhidyādau tīkṣṇasūcyādinā tataḥ | tatraiva cetanāṃ yuktvā bhairave nirmalā gatiḥ
anuṣṭubh
— किसी अंग को (कर्म कारक) ; — तीक्ष्ण सूई आदि से (करण कारक — समासगत) ; — निर्मला (शुद्ध) गति (कर्ता कारक)

[पुनरुक्ति — श्लोक ७६] पहले किसी अंग को तीक्ष्ण सूई आदि से बेधकर, वहीं चेतना को नियोजित करके (साधक की) भैरव में निर्मला गति हो जाती है।