Vijñāna Bhairava Tantra · 1.127

Vijñāna Bhairava Tantra 1.127

1.127
व्योमाकारं स्वमात्मानं ध्यायेद्दिग्भिरनावृतम् । निराश्रया चितिः शक्तिः स्वरूपं दर्शयेत्तदा ॥१२७॥
vyomākāraṃ svam ātmānaṃ dhyāyed digbhir anāvṛtam | nirāśrayā citiḥ śaktiḥ svarūpaṃ darśayet tadā
anuṣṭubh
— व्योम-आकार, आकाश-स्वरूप (कर्म कारक — समासगत) ; — दिशाओं से अनावृत (विशेषण) ; — निराश्रया चिति-शक्ति (कर्ता कारक)

[पुनरुक्ति — श्लोक ७५] अपने आत्मा को व्योम-आकार, दिशाओं से अनावृत, ध्यान करे; तब निराश्रया चिति-शक्ति अपना स्वरूप प्रकट करती है।